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Showing posts from 2016

आओ हम आजादी की वर्षगांठ मनाये

आओ हम आजादी की वर्षगांठ मनाये भाषण  सुने या चबाये रोये या गाए चीखे चिल्लाए  हमें पूरी आजादी है ! आखिर , ऐसा करते हमें इतने बरस भी तो हो गए  यह अलग बात है की  इतने बरसो में  हमें आजादी का अर्थ नहीं जाना  उसे कभी नहीं पहचाना  हम दिशाहीन भटकते रहे  जिसने जो दिशा दी  उसी में बढ़ते रहे  आजादी का अर्थ  उनके लिए था  जो उसके लिए  लड़े मरे  वो गुलाम थे  हम आजाद है  हमारे विचार  कुर्सी के आसपास  परिक्रमा लगाते उपग्रह  सभ्यता मॉड हो गयी  संस्कृति शॉर्ट हो गयी  अब हमें सूरज का उगना  अच्छा नहीं लगता  उसका अंत अच्छा लगता है  पूर्व बूढ़े खूसट सा  खटकने लगा है  पश्चिम  मादक रंगो सा आँखों में चढ़ने लगा है  आदर्श, तस्वीरें बनकर  शासकीय कार्यालयों में लटक गए  यह कहना गलत है की हम भटक गए  भटकते वे है , जो किसी राह पर चलते है  हमने इसी डर से कोई राह नहीं चुनी  जहाँ चल दिए कदम  हम चल दिए  हम आज...

सावन तो है

आओ हम तुम सावन के गीत गाए बादल आये या न आये बरसे न बरसे रुखा सूखा ही सही सावन तो है आओ हम तुम झूले झुलाए बैठे बतियाये हरी-भरी न सही सुखी टहनी ही सही सावन तो है ! आओ हम तुम सुने - सुनाए मन बहलाए घर और बच्चे अपने हिस्से इनके किस्से रोज का ढर्रा ही सही सावन तो है !

नजर का चश्मा

जब से उन्होंने नजर का चश्मा बदला है उनका नजरिया ही बदल गया ! उन्हें अच्छे और बुरे की पहचान होने लगी है या की उनकी आँख पहेली बुझने लगी है ! डॉ रविन्द्र पहलवान मेरे पास आये काफी देर तक बैठे / बतियाये कुछ समझे कुछ समझाए बोले जोशी जी बुरा नहीं मानना एक बात कहु इस चश्मे में तुम अच्छे नहीं लगते हो मैंने कहा इसमें बुरा मानने की क्या बात है जो जैसा है वैसा की तो दिखेगा गोभी का फूल गुलाब थोड़े ही दिखेगा डॉ रविन्द्र बोले ऐसा भी नहीं है चस्मा हटा लेता हु तो तुम अच्छे लगते हो ! यह क्या जादू मंतर है मेने कहा मित्रवर दूसरों की आँखों से और अपनी आखो से देखने में यही अंतर है ! सत्य लगी आँखों से ही देखा जाता है और दूसरों के सहारे की जरुरत है तो उसकी विश्वसनीयता जरुरी है , वर्ना साडी बात अधूरी है ! मैने कहा की मित्रवर तुम्हारा चश्मा विस्वसनीयता नहीं इसे बदल दो वर्ना गंगा को यमुना और यमुना को गंगा देख जाओगे जाना होता टेलीफोन नगर राजवाड़ा पहुंच जाओगे ! पता नहीं, उन्होंने चस्मा बदला या नहीं ! लेकिन अब जब भी मेरे पास होते है ! चस्मा उतार लेते है ! शायद मेरे वेश में समू...

मीत मेरे

मीत मेरे खो गए तुम कल तो मेरे सांथ थे और बंधे हाथ थे , भावी कल का ताना - बाना बुनते नए सबेरे की आशा में पथ का अँधियारा पीते गाते , गुनगुनाते चल रहे थे, नया पंथ गढ़ रहे थे आदमी होना कितना जरुरी होता है न हो आदमी तो जीवन कितना रोता है सदियों से आदमी, आदमी होने को तरसता है आदमी, आदमी होने से मुकरता है आदमी होना कितना जरुरी होता है यही तुम बतला रहे थे मुझे उंगली पकड़कर चला रहे थे यह क्या किया पथ पर अकेला छोड़ दिया मुझे और तुम सो गए चिरनिद्रा में न जागने के लिए ! में अकेला ही खड़ा हु सूझ नहीं पड़ती क्या करू, किधर मोदु स्वयं को मेरे ये नन्हे हाथ, तुम्हारी उंगली थमे थे जब तक निश्चिंत थे ये नन्हे पांव अंनथके चल रहे थे तुम्हारे अचानक सो जाने से विचलित करदिया है मुझे लगता है यह सत्य मुझे भोगना पड़ेगा अब लाल स्याह सूरज नहीं चमकेगा भाल पर सिंदूरी शाम अब कभी नहीं उगेगी न चंदा शरमएगा न चांदनी नहाएगी बस रहेगी मेरे सांथ अमावसी रात उम्र भर वही स्याह रात बोना और काटना है !

टेलीफ़ोन

हे टेलीफ़ोन के जन्मदाता ग्राम बेल तुम्हे धन्यवाद ! जो तुमने ऐसे पुत्र को जन्म दिया ! वैसे एक धरती के एक अंधे धृतराष्ट्र ने सो पुत्रों को जन्म दिया ! कोई बताये इस  देश के लिए उन्होंने क्या किया ! तुम्हारा पुत्र, सारे संसार का एक आवशयक अंग है वह तारे पर झूमती एक तरंग है ! किसी का दर्द, किसी का गीत, किसी की पीड़ा, किसी का मीत समूचे विश्व को रखता है चेतन क्या हुआ जो उसका है काला तन पुत्र उगाने में हम पीछे नहीं पुत्रों का जंगल खड़ा है कही बेवस पड़ा है कही अड़ा है, कही सड़ा है, कही गढ़ा है फिर भी पुत्र उगाने की परंपरा जारी है

घर नहीं

किस पर कर सके भरोसा , किस पर करे यकि यहाँ आदमी की सूरत इक रहती नहीं ! चेहरे पर लगे चेहरे कोई कमी नहीं में ढूंढ़ता हु आदमी मिलता कोई नहीं ! किसको सुनाऊ अपने दास्ताने गम देखि न आँख कोई जिसमे नमी  नहीं ! कोई नहीं पराया अपने तो है सभी ये और बात है की अपने होते नहीं ! तमाम उम्र बंधे आकाश को फिरा अंत समय मुट्ठी में राख भी नहीं ! यू तो हमारा सूरज और है हमारा चाँद सारा जहां हमारा रहने को घर नहीं !

मेरी नाव में

घुंघरू बाँध गया कोई उसके पाँव में बदली हुई हवा है अबके गाओं में ! ऐसी तपन, ऐसी उमस अबके मौसम में लोग जल रहे नीम की छाँव में ! बाजी सारी हार दी बस एक आस में की जीत ही जायेगा वो अगले दाव में ! सुकून से में रह सकु स्वीकार था नहीं काटे बिखेर डाले उसने मेरी ठाव में ! कैसे ले जाऊंगा उस पार में उसको छेद ही छेद है मेरी नाव में !

सभल के चल

बिगड़े हुआ हालात है जरा संभल के चल, धूल, धुंआ, धुंध है जरा संभल के चल ! पसरी हुई है दहशते, सड़कों चोराहो पर तुझे पहुंचना  है घर जरा संभल के चल १ कोयला ही कोयला बिखरा पड़ा मैदान में कैसे बच पायेगा जरा संभल के चल ! रह के कुछ संगमरमरी आचरण भी है पैर फिसल न जाये जरा संभल के चल ! ये आदर्श की गठरी कब तक लिए चलेगा हर  मोड़ पर है लुटेरे जरा संभल के चल !

क्या, पिला दिया :)

फितरत नहीं है मेरी पीकर बहक जाना साकी ज़रा बता तूने क्या पिला दिया ! ये मेनका ये उरवर्षी तपोघन की बिजलियाँ माटी के इस बदन में तूने क्या मिला दिया ! अश्क बनके रह गया तेरी प्रेम कथाओ का मेरे प्यार का तूने क्या सिला दिया ! भटक गया था राह ख्यालों की धुंध में शुक्रिया ए मित्र, तूने घर बता दिया ! विस्वास के घूँघट में फरेब ही मिला बता अमिया मुज़हे विष पिला दिया !

रौशनी जाने कहाँ

इतनी बढ़ गयी है भूख की रोटी भी बट गयी यू बस गयी है बस्तियां की जमीन घट गयी ! भीड़ भी लगने लगी आजकल डरावनी खौफ बन के साये सा तन से चिपट गई ! सूर्य भी लाचार सा लगने लगा है आजकल रौशनी कहाँ रह में भटक गयी ! मीठी मुस्कान, किराने की दूकान, सहकारी ब्याज इस बड़े परिवार में आदमी गोट सारी बट गई दो ही फूल खिलाए उसने, घर उसका महक गया ! चाँद भी आकर ठहर गया, चांदनी भी छिटक गयी !

चुटकी भर चांदनी

चुटकी भर चांदनी  रखकर हथेली पर देखता हु तुमने सब व्योम भर डाला है ! आँखों में उतर आयी बावरी उमरिया देखता हु तुमने सब सोम पी डाला है ! होठ भर हिले है पलक भर झुके है देखता हु तुमने सब कुछ हो कह डाला है ! लाली, बिंदी, मेहंदी कंगन बिछिया चुनरी देखता हु तन-मन सब उपवन कर डाला है ! अंगो से परिचय अभी तो हुआ है देखता हु तुमने सब समर्पण कर डाला है !

बहु त हो ता है :)

गंधहीन सो पुष्पों के होने से एक गन्धमय सुमन बहुत होता है ! वह मंतव्य क्या जो शब्द जाल बना करे अर्थ के लिए एक शब्द बहुत होता है ! तन का समर्पण तो एक बेईमानी है प्यार के लिए एक स्पर्श बहुत होता है ! रिश्ते तो जिंदगी के छूटे सहारे है आदमी का तो एक विश्वास बहुत होता है ! लाख जड़ लो सितारे चुनर में अपनी होने को तो एक चाँद बहुत होता है ! दौर पर दौर चलाओ तो क्या है मतलब मदहोश करने के लिए एक जाम बहुत होता है !

चहरे बदल के

बदनाम हो रहे बस्ती के अँधेरे ! बदतमीजी कर रहे कुछ घर के सवेरे :) श्रम भिन्दुओ से जो रच रहे सभ्यता ! काचे पे धो रहे है वो अपने बसेरे !! किस्से करे गुहार लचर मछरी ! ताल के रवैये बन बैठे मछेरे !! पेटो से है वादे न भूखे मरेंगे ! जीने के लिए दे रखे है स्वप्न सुनहरे !! ईमान के पुजारी धर्म की प्रतिष्ठा ! चेहरे बदल के बैठे है कुछ ऐसे लुटेरे !!

शरद चांदनी

श्वेत वस्त्र धार हुई सुंदरता निर्वासिनि ! जंगलों में भटकती हुई होती है शरद चांदनी !! मखमल से, मलमल सी, छुई मुई सी गात ! दूध में नहाई हुई होती है शरद चांदनी !! बिछी हुई हो जैसे कोई संगमरमरी दरी ! फिसलते नयन सी होती है शरद चांदनी !! न तारे मन लुभाए न चुनरी रिझाये उठे हुआ घूँघट सी होती है शरद चांदनी

आलम बदल गये

जब तलक था होश, वीरान थी बहार ! जाम जब उठाया तो मंजर बदल गए !! यह हमारी बदनसीबी और उसका ये सिला ! इकरार थे हम कर रहे और वो बदल गये !! जिनने कस्मे खाई थी एक नाव में बैठकर ! साहिल जो मिला तो मकसद बदल गये !! रौशनी में नहाई होती है यू तो हर सुबह ! जब जब चिराग बुझे है आलम बदल गये !! उनका वादा था तमाम उम्र का ! रहबर उन्हें मिले तो रही बदल गये !! हम क्या बया करे बदलने की हदो का ! बरगद के नीचे बैठकर सिद्धार्थ बदल गये

बुलायो है

प्यार की पुकार से और मनुहार से आज मनमीत ने घर हो बुलायो है ! रोम-रोम हरसे मन एसो सरसे जाने मेरो चंडी आज दूध में नहायो है ! पग उठी किधरी पग घरउ किधरी ! एसो तन-मन ने सुध बिसरायो है ! प्रेम उमगि - उमंगी आज डिंग  चिढ सजल नयन जैसी सावन सजायो है ! धीर धरि धरनी धर्म धुरी धार के धिरे धीरे धरन,धरन धधकायो  है ! बार-बार उठी धऊ गली कहियां डारु मीत मोसे कहे आज बावरो हो आयो है ! न सोयो न सूयाओ, रंग ऐसा घणो छायो मन का मोहन देखो ऐसे हर्षयो है !

बादल (यू गरजता है )

बादल आने की खबर थी आये नहीं बादल बस एक झलक को तरसा गए बादल ! कही बाँध भी नहीं सुखी पड़ी धरती कही झूम-झूम नाचे है बादल ! ध्वस्त हो गए सपनो के सब महल गर्दिशों के जब फट पड़े बादल ! दर्द विहरणी जे अंतस में उतर जाए अश्क बनके झरने नयनो से ये बादल ! कभी घोडा कभी हाथी कभी परियो की कथाएं बच्चों के लिए खेल हो जैसे ये बादल ! मौन ही सही उनकी भी है भाषा हस्ते भी है कभी रोते भी है बादल

सूरज के बहार भरे दिन

सूरज के बहार भरे दिन कुहुक रही अमराई अम्बुका के ठाँव चंपा चमेली के थिरक रहे पाव ! सूरज के उभार भरे दिन ! चटख रहा टेसू जंगल की चोर चमकीले गेसू ले रहे हिलोर ! सूरज के निखार  भरे दिन ! सुर्ख लाल रंग पलाश छा रहा ! महुआ की टेर गीत कोई गा रहा ! सूरज के छूहार  भरे दिन ! गदराई दोपहरी का धूप भरा रंग थके थके नयन न देख पाये अंग ! सूरज के अंगार भरे दिन ! अश्मित हवाओं का साय साय गुंजन नीम और पीपल का करतल अभिननदन ! सूरज के शृंगार भरे दिन ! नदी के अधर पर रवि के अधर प्यास ही प्यास इधर उधर ! सूरज के प्यार भरे दिन !

भोर के प्रहर की तुम

तुम जो गुनगुनाती जैसे गुनगुनाती जिंदगी भोर के प्रहर की तुम  जैसे बंदगी ! तुम ही सुरसिंगार हो रश्मियों के राग की ऋतू के सुहाग की बगिया के फाग की ! तुम जो खिलखिलाती जैसे खिलखिलाती जिंदगी भोर के प्रहर की तुम  जैसे बंदगी ! तुम तो एक समर्पण हो भावना की रीत का श्रृद्धा के संगीत का मीत के प्रीत का तुम जो महकती हो जैसे महकती है जिंदगी भोर के प्रहर की तुम  जैसे बंदगी ! तुम तो एक गीत हो शब्द के दुलार का कल्पना के हार का स्वप्नों के श्रृंगार का ! तुम जो सवरती हो जैसे सवरती है जिंदगी भोर के प्रहर की तुम  जैसे बंदगी ! तुम तो एक प्रवाहिनी नदिया के धार की समय के पुकार की वशी की मनुहार की तुम जो बहती हो जैसे बहती है जिंदगी भोर के प्रहर की तुम  जैसे बंदगी !

तुम मिली ही नहीं (Google kiya)

ढूंढा ही किया तुम्हे उम्र भर तुम मिली ही नहीं स्वप्न भर के लिए ! मैंने भिडो में खोजा तुम्हे प्राणप्रिये विरानो में खोज तुम्हे प्राणप्रिये में पलकें उठाये देखा किया ! तुमने दिखी ही नहीं आंखियां भर के लिए ! ढूंढा ही किया तुम्हे उम्र भर के लिए ! भावना को सजाना लगा कल्पना अक्षरों को बैठाना हो जो अल्पना रचना को में लिखता मिटाता रहा तुम मिली ही नहीं शब्द भर के लिए ! ढूंढा किया तुम्हे उम्रभर तुम मिली ही नहीं स्वप्न भर के लिए ! मैंने पीड़ा का चमन जगाया प्रिये पंथ काँटों का मैंने बनाया प्रिये दर्द की चोखट को मैं छूता फिर तुम मिली ही नहीं अश्क भर के लिए ! ढूंढा ही किया तुम्हे उम्र भर तुम मिली ही नहीं स्वप्न भर के लिए !

सूरज को बोन दो

बहुत ढो चुके अंधियारे अब उजियारे धोने दो उगा चुके हम काली फैसले अब सूरज को बोन दो ! कब तक बोने बने रहे हम अपने ही आकाशों में कब तक खुद को छलते रहे हम अपने विश्वासों में बहुत सह चुके बौनेपन को अब आकाश होने दो उगा चुके हम काली फैसले अब सूरज को बोन दो ! कब तक गतिमय होने का यह मतिभ्रम हम पाले स्थिर रहकर आपने ही पावो में उगाए छाले ! बहुत रह लिए स्थिर हम, अब गतिमान होने दो उगा चुके हम काली फसले अब सूरज को बोन दो ! आश्वासन की मदिरा कब तक गले उतारे आशाभरी निगाहो से कब तक शुन्य निहारे बहुत रह चुके मदिरमय अब होश में होने दो ऊगा चोक हम काली फसले अब सूरज को बोने दो ! अब तक अंधियारे बीने और कब तक अक्षर रोपे आने वाले कल की हम कैसे उत्तर सोपे ! बहुत लग चुके प्रश्नचिन्ह अब उत्तर होने दो ऊगा चुके हम काली फैसले अब सूरज को बोन दो !

जीवन के चार दिन

पथरीली पीड़ाएं,मुसीबतों जंगल दुर्गा रहे, न मिले कही मंगल पोर-पोर कसके पहाड़ के दिन ऐसे भी होते है जीवन के चार दिन ! किलोल खुशियां चहकता आकाश पुष्पित है रहे उल्लासित सी स्वांस पोर-पोर महके बगिया से दिन ऐसे भी होते है जीवन के चार दिन संघर्षी सबेरा बिसरि हुई श्याम दर कदम युद्ध खोया विश्राम पोर पोर चलते सड़कों से दिन ऐसे भी होते है जीवन के चार दिन

पीपल की छैया (मेरा देसी टिपिकल सैया )

घूम रही पवन-तपन डाले गलबहिया ऐसे में याद आये पीपल की छैया मौसम की बाह पकड़ चले प्रेम बतिया आँगन चौबारे की पीछे कनबतिया देहरी द्वार देख देख अरे दइया दइया ऐसे में याद आये पीपल की छैया ताने,उलाहने जब लांघे घर की देहरी जैसे भोर होते ही हो जाये दोपहरी संकोची मन की व्यथा अरे ता- ता थैया ऐसे में याद आये पीपल की छैया जीवन के तर पर जब राग सज न पाये पल-पल अँधियारा, धुंधलका दिखाए प्राण उड़ना चाहे जब बनके चिरैया ऐसे में याद आये पीपल की छैया 

हे गणतंत्र तुम्हे प्रणाम

हे गणतंत्र तुम्हे प्रणाम हे जनतंत्र तुम्हे प्रणाम मुक्त गगन उन्मुक्त पवन निर्बन्ध बंध निर्बाध गंध हे जनतंत्र तुम्हे प्रणाम तुम साधिकार तुम निर्विकार सम्द्रस्टी मंत्र निरपेक्ष तंत्र हे लोकतंत्र तुम्हे प्रणाम तुम ज्ञान धर्म अनुरक्त कर्म नुम सतत प्रवाह अनमोल मंत्र हे प्रजातंत्र तुम्हे प्रणाम तुम प्रगति दीप सागर के सीप तुम पंचशील तुम पंचतंत्र हे गणतंत्र तुम्हे प्रणाम 

तुम आये नहीं

दरवाजे पंथ निहारा करी तुम आये नहीं , तुम आये नहीं संध्याएं भी लौटकर जाने लगी रहें भी चुप्पी ढोती रही मैं आस का दीप जलाती रही ! खड़ी होकर आईने के सामने रूप सवार किया ही करी आँचल को उठाती गिराती रही प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं दरवाजे पंथ निहारा करी प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं में प्रीत में बावरी होती रही मछली सी बेकल तड़पती रही में हर पल भाव छुपाती रही प्रीत आये नहीं तुम आये नहीं मेने सेज बिछाई तुम्हारे लिए पाँव पायल भी बांधी तुम्हारे लिए प्याली पर प्याली गिरती रही दरवाजे पंथ निहारा करी प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं में अक्षत कुमकुम रोली को थाली में संजोए बैठी रही में सुनी कलाई ढूंढा करी वीर आये नहीं तुम आये नहीं दरवाजे पंथ निहारा करी प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं 

मर गया होता

यू दर - बदर न होता गर उसका भी घर होता ! सहारा मिल गया उसे वर्ना मर गया होता ! पहचान लेता में उसे अगर जिंदगी का सहर होता ! मीरा मीरा न होती गर पिया जहर न होता !

मदारी खाये

खड़ा - खड़ा तू मेड पर जार - जार क्यों रोए बोया पेड़ बाबुल का तो आम कहाँ से होए ! परिभाषाएँ बदल गयी बदल गया परिवेश जिसके है में लाठी हुई उसकी भेस ! पंगती में खड़े - खड़े बरस हुआ अवधेश अंधा बांटे रेवड़ी अपने अपनों को दे ! चमचा मोसा न कहो सब ऑफिस को फेर पनि में रहकर करे कौन मगर से बेर ! भ्रस्टाचार ख़त्म करेंगे दवा जता रहे वे अपनी हथेली पर सरसो उगा  रहे ! अब का होए रोत से जग की रीत बताए नाचे कूदे बांदरी मॉल मदारी खाये !

अहम वयम्

जिंदगी की राह में मेरा तुमसे मिलन हो गया प्रीत पंथ पर तुम धरा और में गगन हो गया ! मेरा एक - एक छन ही तेरे संग संग रहा तुम तो अहम ही रही और में वयम् हो गया एक एक ग्रन्थ के सभी संदर्भ थे हमने जिए तुम तो विचार ही रही और में मनन हो गया ! तेरे द्वार पर में तो याचक बनकर रहा तुम तो प्रार्थना ही रही और में नमन हो गया ! थाल में पूजा का लिए मंत्र  को उच्चारते  रहे तुम तो यज्ञ वेदी  ही रही और में हवन हो गया ! तुम तो दो कदम ही चली और में चलता रहा तुम तो मेड भर रही और में वतन हो गया उत्तरो के व्योम में हम प्रश्न बनके घूमते रहे तुम तो स्रजिका ही रही और में सृजन हो गया !

जिन दरवाजों पर

जिन दरवाजों पर  दस्तक है वे दरवाजे बंद है लूटने वाले हजार चमन है लुटने  वाले चाँद है तम की सीमा घट नहीं सकती सूरज से अनुबंध है ! चाँद यहाँ ऋणग्रत ही रहता चांदनी पर पेबंद है ! जिन हातो में रक्त लगा है वे  ही यहाँ निर्बन्ध है ! गीत यहाँ कैसे सज पाये प्रतिबधित जब छन्द है ! एक तो है विकलांग सफर उस पर सामने अंध है ! हर मास नहीं मधुमासि मौसम के प्रतिबन्ध है !

अपने - अपने राम

सबके अपने - अपने राम अपने अपने झंडे अपने अपने धाम ! सबकी अपनी-अपनी गलिया अपनी-अपनी राह अपनी-अपनी धुप अपनी-अपनी छाए ! सबकी अपनी-अपनी सुबह अपनी-अपनी शाम अपने अपने झंडे अपने अपने धाम ! सबके अपने अपने तोल अपने अपने पैमाने अपनी-अपनी मंडी अपने अपने मैखाने ! सबकी अपनी-अपनी फितरत अपने अपने दाम अपने अपने झंडे अपने अपने धाम ! सबकी अपनी-अपनी खुशियां अपने अपने सुख अपनी-अपनी पीड़ा अपने अपने दुःख सबकी अपनी-अपनी माझिल अपने अपने मुकाम अपने अपने झंडे अपने अपने धाम ! सबके अपने अपने गीत अपने अपने गान  अपनी-अपनी धुन  अपनी-अपनी तान सबकी अपनी-अपनी नीरवता अपने अपने कोहराम अपने अपने झंडे अपने अपने धाम ! सबकी अपनी-अपनी भक्ति अपनी-अपनी  शक्ति अपने अपने मान अपने अपने गुमान ! सबकी अपनी-अपनी प्रार्थना अपने अपने प्रणाम अपने अपने झंडे अपने अपने धाम !

जीवन

जीवन को किसने जाना है किसने इसको पहचाना है अलग अलग रूपों में जाना फिर भी यह अनजाना है ! जीवन खुशियों का मेला है जीवन दुखो का रेला है कभी भीड़ - भाड़ बन जाता तो कभी वह निपट अकेला है ! कही  गीत  कही तराना है जीवन को किसने जाना है काँटों में भी हँसता जीवन भरी धूप में तपता जीवन फूलों सा सुकुमार कही जीवन और कही पाषाण है जीवन ! रोना और मुस्कुराना है जीवन को किसने जाना है ! बहता जीवन ताड़ी सा लगता ठहरा जीवन ताल सा लगता संघर्षो का झरना तो कभी गहरे सागर सा लगता सीप से मोती पाना है जीवन को किसने जाना है ! मौसम सा लगता है जीवन प्रकृति के रंग सा है जीवन कभी हरा भरा लहराता तो कभी रुखा-सूखा लगता जीवन लहरों पर लहराना है जीवन को किसने जाना है ! कभी धरती की धीर सा लगता कभी नयनो के नीर सा लगता दुःख-दर्दो का पर्वत है तो कभी पंछी की पीर सा लगता कही जलना , कही जलाना है जीवन को किसने जाना है ! रंगमंच सा दीखता, जीवन पर्दा उठता गिरता जीवन कभी नायक खलनायक तो कभी विदूषक बनता जीवन कभी खोना कभी पाना है जीवन को किसने जाना है !

परिवार में

मिल जुलकर खुशहाल रहे परिवार में हंसी ख़ुशी का जीवन है परिवार में ! माँ की ममता, पिता का प्यार बहन की राखी, भाई की हिम्मत सबकुछ है परिवार में ! देवर भाभी, जेठ-जिठानी, दादा-दादी फूफा-फूफी रिश्तों का गुंजन होता परिवार में ! आंसू, पीड़ा, तने उलझन, मान-गुमान ाककि जीवन हो जाता कभी कभी परिवार में ! झरता झरना, बहती सरिता , सागर सी गहराई स्वप्ना शृंखला बन जाती है कभी कभी परिवार में ! सीमा रेखा खींची हुई हो दुरी चाहे बनी हुई हो भावो के अटूट बंधन में रहते सब परिवार में !

धुन होगी तो

धुन होगी तो धरणीधर भी हिल जायेगा ! धुन होगी तो मुरलीवाला भी मिल जायेगा !! पीड़ाओं का हाहाकार सहकर, बन जाता ध्रुवतारा जलती ज्वाला से बच पाता धुन का पक्का बाल - दुलारा धुन होगी तो विष भी अमृत हो जायेगा ! एक लगन को बांध के मन में अम्बर से गंगा ले आया माटी की मूरत के संग में वीर धनुर्धर वह बन पाया धुन होगी तो पंगु गिरिवर चढ़ जायेगा ! धुन होगी तो धरणीधर भी हिल जायेगा ! तन को जलाता और तपाता तब जाकर सोना बन पाता अनगिनत पलकें जागती रहती तब जाकर हिरा मिल पाता गन होंगे तो गन का ग्राहक भी मिल जायेगा धुन होगी तो धरणीधर भी हिल जायेगा !

वतन ही मेरी शान है

गान है गुमान है वतन ही मेरी शान है मान है अभिमान है वतन ही मेरी शान है वतन ही मेरी पूजा है वतन ही मेरा धर्म है वतन ही मेरी कॉम है वतन ही मेरा कर्म है आन है सम्मान है वतन ही मेरी शान है गान है गुमान है वतन ही मेरी शान है वतन ही मेरी गीता है वतन मेरी कुरान वतन ही मेरी आरती वतन ही मेरी आजान साँझ है दिनमान है वतन मेरा विहान है गान है गुमान है वतन ही मेरी शान है मान है अभिमान है वतन ही मेरी शान है वतन मेरी इबादत वतन ही मेरी भक्ति वतन ही मेरी ारदस वतन ही मेरी शक्ति साज है सुरमान है वतन ही मेरी शान है गान है गुमान है वतन ही मेरी शान है मान है अभिमान है वतन ही मेरी शान है मजदूर है किसान है खेत और खलियान है तीर और कमान है सत्य और ईमान है वतन ही मेरी शान है गान है गुमान है वतन ही मेरी शान है मान है अभिमान है वतन ही मेरी शान है !

विवश के गाल पर

कैसे हस्ताक्षर कर डाले तुमने समय के भाल पर की नमी छा गए किसी विवश के गाल पर तुमने जो सम्बन्ध बोये थे अपनेपन के सपने बनवाए थे आदर्शो के मीत  के अपना उच्चापन देखर छोड़ा ऐसे ढाल पर की नमी छा गए किसी विवश के गाल पर प्रश्न चिन्ह की बनी तुम उत्तर आगत बानी प्रतीक्षा की बंटवाया की अर्थ बानी परिणाम बानी परीक्षा की विश्वासी प्रतिबिम्ब सौपकर छोड़ा ऐसे हल पर की नमी छा गए किसी विवश के गाल पर मरुथल से सुने जीवन से मधुमासि अनुबंध किये प्रतिमानों की पीड़ा पीकर सुख के सब प्रतिबन्ध जिए सारा सावन मुझसे लेकर छोड़ा ऐसे मलाल पर की नमी छा गए किसी विवश के गाल पर जाने ये मौसम बदला या हवाओं राह की भटक गयी जंगल के सूखे व्रक्षो पर गंध कुसुम की लटक गयी सांस सुवास लूटकर मुझपर, छोड़ा ऐसे पाल पर की नमी छा गए किसी विवश के गाल पर !

गीत सुनाने आऊंगा

तुमने मुझे बुलाया है तो गीत सुनाने आ जाऊंगा तन का मन का, अपनेपन का गीत तुम्हे सुना जाऊंगा ! भाग रही है धरती सारी नहीं किसी को फुर्सत पल की किसकी आँखों में उमडा सावन किसकी पीर आँख से छलकी ! इसी बहाने संग तुम्हारे पल भर जीवन प जाऊंगा तुमने मुझे बुलाया है तो गीत सुनाने आ जाऊंगा ! अपने अपने में खोया है सस्ट्री का यह सारा जन जीवन कौन है जीता कोण है मरता किसको  चिंता  अपना अर्चन ! शब्दों की इस क्षिप्रा के संग महाकाल को छू जाऊंगा तुमने मुझे बुलाया है तो गीत सुनाने आ जाऊंगा ! कोई महल बनाता अपना कोई ठोक रहा टपरी कंचन दमके किसी के घर में किसी की छत पर नहीं खपरिया ! वैभव विराग के इस सागर की एक लहर में पा जाऊंगा तुमने मुझे बुलाया है तो गीत सुनाने आ जाऊंगा ! आपने हाथो गढ़ते प्रतिमा को जाती है वाही पराई हर पल छलती रहती है अपनी स्वयं की परछाई ! आस नीरस के महारास में अपना गुंजन पा जाऊंगा तुमने मुझे बुलाया है तो गीत सुनाने आ जाऊंगा !

बदला परिवेश

बदला परिवेश अनुशासनहीन हुआ आज मेरा देश सोने की चिड़िया का बदला परिवेश  ! झूट आज यो गया वक्त का प्रमाण सत्य आज हो गया घर में गुलाम चरणी गीत सब बन गए वंदन नकली खुशबुओं में आज बिक रहा चन्दन ! भ्रस्ट आचरण आज बन गया गणवेश सोने की चिड़िया का बदला परिवेश ! कोरे आश्वासन और खोखले नारे टूटे आदर्शो के ढूंढते सहारे शक्ति का अभिमान और रिश्तों का तंत्र सफलता का बन गया रिश्वत ही मंत्र ! पूज्य है पुजारी और पूजन अन्वेष सोने की चिड़िया का बदला परिवेश !

धरती संवार लो

अम्बर से स्वर्ग को उतार लो आज सारी धरती संवार लो ! सज उठे सवर उठे धरती का आँगन भी नगर नगर ग्राम ग्राम डगर डगर कनन भी ! प्यासे पनघट को जलधार दो आज सारी धरती संवार लो ! जन सुमन को गूथ लो एकता के हर में एक स्वर गुंजार हो वीणा के हर तार में ! खुशियो को हाथ हाथ बाँट दो आज सारी धरती संवार लो ! भेदभाव के तिमिर का अंश-अंश छाँट दो स्वार्थ के भवर में फंसी नोक को घाट  दो ! नेह दिप द्वार द्वार बाल दो आज साडी धरती संवार लो ! शीश श्रद्धा से जहके सभी धर्म ग्रन्थ पर नित नया निर्माण हो विकास के पंथ पर ! वसुधा के नूतन शृंगार दो आज सारी धरती संवार लो !

उसका क्या दोष

नदी का काम है बहना वह बहती है संग कोई बाह जाये तो उसका क्या दोष है ! सूरज का काम है जलना वह जलता है कोई झुलस जाये तो उसका क्या दोष है ! फूल का काम है खिलना वह खिलता है कोई मचल जाये तो उसका क्या दोष है ! मौसम का काम है बदलना वह बदलता है संग कोई बदल जाये तो उसका क्या दोष है ! हवा का काम है बहना वह बहती है कोई उड़ जाये तो उसका क्या दोष है ! मय का काम है मदहोश करना कोई बहक जाये तो उसका क्या दोष है !

अब के बरस

अब के बरस बरस तू बरस ! मेरे आंगन में तू मेरे गाँव में मेरे कंगना में तू मेरे पाँव में ! मेहंदी रची मेरी हाथ की हथेली पायल बानी मेरे पाँव की सहेली रात रात होगी बाते सरस - ाबके बरस ! अबके  बरस बरस तू बरस  ! सितारों जड़ी लाल रंग चुनरी है औढी काजल बिना न मणि आँख भी निगोड़ी गात-गात करेंगे दरस - परस - अब के बरस ! अबके  बरस बरस तू बरस  ! साँस - साँस लगदी है अब के उमंगी बगिया में छाएगी बहार बहुरंगी रोम रोम में है हर्ष - हर्ष ाबके बरस ! सखी सहेलिया छेड़े मुज़हे आकर ननदी  छेड़े मुज़हे कोहनी लगाकर सावन झुलायेंगे अबके  बरस -अबके  बरसा ! अबके  बरस बरस तू बरस  !

लिख

लिखने जैसा लिख बुधुआ की बीमारी लिख आंसू की लाचारी लिख रख छुपी चिंगारी लिख मौसम की दरबारी लिख लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख ! सूद चढ़ी अटारी लिख खेत में पड़ी दरारि लिखा मेहनत की तिजारी लिख रधिया बेचारी लिख ! लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख ! घोटालीे  कारगुजारी लिख छद्मवेश पुजारी लिख आँखों की अंधियारी लिख गालो  की उजियाली लिख लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख !

हम आजाद है

हम आजाद है जंगल की तरह, उगने के लिए ! हम आजाद है कौओ की तरह काँव-काँव करने के लिए और लड़ने के लिए कुत्तो के तरह ! हम आजाद है भूख से तड़प - तड़प कर मरने के लिए और नंगे बदन गलियो में विचरने के लिए हम आजाद है ! नैतिकता का मुखोटा लगाकर लूटने के लिए हम आज़ाद है , अपनी सभ्यता संस्कृति से बलात्कार करने के लिए हे आज़ादी ! तुम्हे नमस्कार   * --------------------------*