नजर का चश्मा

जब से उन्होंने
नजर का चश्मा बदला है
उनका नजरिया ही बदल गया !
उन्हें अच्छे और बुरे की पहचान होने लगी है
या की उनकी आँख पहेली बुझने लगी है !
डॉ रविन्द्र पहलवान मेरे पास आये
काफी देर तक
बैठे / बतियाये
कुछ समझे कुछ समझाए
बोले
जोशी जी
बुरा नहीं मानना
एक बात कहु
इस चश्मे में तुम अच्छे नहीं लगते हो
मैंने कहा
इसमें बुरा मानने की क्या बात है
जो जैसा है वैसा की तो दिखेगा
गोभी का फूल
गुलाब थोड़े ही दिखेगा
डॉ रविन्द्र बोले
ऐसा भी नहीं है
चस्मा हटा लेता हु तो तुम अच्छे लगते हो !
यह क्या जादू मंतर है
मेने कहा मित्रवर
दूसरों की आँखों से और अपनी आखो से
देखने में यही अंतर है !
सत्य लगी आँखों से ही देखा जाता है
और दूसरों के सहारे की जरुरत है
तो उसकी विश्वसनीयता जरुरी है ,
वर्ना साडी बात अधूरी है !
मैने कहा की मित्रवर तुम्हारा चश्मा
विस्वसनीयता नहीं
इसे बदल दो
वर्ना गंगा को यमुना और यमुना को
गंगा देख जाओगे
जाना होता टेलीफोन नगर
राजवाड़ा पहुंच जाओगे !
पता नहीं,
उन्होंने चस्मा बदला या नहीं !
लेकिन अब जब भी मेरे पास होते है !
चस्मा उतार लेते है !
शायद मेरे वेश में समूचे देश को देखते है
और वे आपने देश को
विवेकहीन, संज्ञा हीन , अनैतिक , अराजक
नहीं देखना चाहते
वे चाहते है उनका देश
देश का वेश
हरदम अच्छा दिखे !

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