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Showing posts from December, 2014

सुबह से शाम

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चलो चले सूरज को पहाड़ पर चढ़ाए दौड़े दौदाये और खूब छकाये अँजुरी भर-भर धूप उछाले पात पात किरणें पेड़ पर चढ़ाए भर भर किल्कारिी अंबर गुंजाए चलो चले सूरज को .... मैदान में खिलाये दौड़े दौदये और खुब छकये चलो चले सूरज को ताल में दुबये साँझ घर लाए दीप् जलाये सूरज को पहाड़ पर चढ़ाए

ठंड

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गाँव शहर घूम रही बद्द्बद्दति ठंड उसको डरा ना पा रही आग भी प्रचंड बंद है दरवाजे और सारी खिडकियां धक धकाति घुसती चली आ रही है ठंड सूर्य भी लाचार है उसके सामने रजाईयों में दुबक गए सारे मुस्तंद पहनी जो स्वेटरे और ऊनी कोट हमारा मुह चिढ़ा रही कैसी है ठंड कौन करे हिम्मत जो मुक़ाबला करे बच्चों इसका नाम है कड़कड़ाती ठंड

जीवन के दो रूप

दिवस, थका मांदा, कंप्यूटर के कार्य से, उलज़कर आया चाय की प्यालियों में वोटिंग में, सैरो में, पार्को में, बंट गया जीवन श्याम की बाहो में ज़्हूल गया, भूल गया ! उधर, श्रमिकों हांफता कल को बांचना ऊँची इमारतों की तह में बसी ज़्होपडियो में संध्या को बिसर गया !

लिख

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लिखने जैसा लिख बुधुआ की बीमारी लिख आसु की लाचारी लिख राख छुपी चिंगारी लिख मौसम की दरबारी लिख लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख सूद चढ़ी अटारी लिख खेत में पड़ी दरारी लिख मेहनत की तिजारी लिख रधिया बेचारी लिख ! लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख घोटाला कारगुजारी लिख छद्मवेशी पुजारी लिख आँखों की अंधियारी लिख गालो की उजियारी लिख ! लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख