मीत मेरे
मीत मेरे खो गए तुम कल तो मेरे सांथ थे और बंधे हाथ थे , भावी कल का ताना - बाना बुनते नए सबेरे की आशा में पथ का अँधियारा पीते गाते , गुनगुनाते चल रहे थे, नया पंथ गढ़ रहे थे आदमी होना कितना जरुरी होता है न हो आदमी तो जीवन कितना रोता है सदियों से आदमी, आदमी होने को तरसता है आदमी, आदमी होने से मुकरता है आदमी होना कितना जरुरी होता है यही तुम बतला रहे थे मुझे उंगली पकड़कर चला रहे थे यह क्या किया पथ पर अकेला छोड़ दिया मुझे और तुम सो गए चिरनिद्रा में न जागने के लिए ! में अकेला ही खड़ा हु सूझ नहीं पड़ती क्या करू, किधर मोदु स्वयं को मेरे ये नन्हे हाथ, तुम्हारी उंगली थमे थे जब तक निश्चिंत थे ये नन्हे पांव अंनथके चल रहे थे तुम्हारे अचानक सो जाने से विचलित करदिया है मुझे लगता है यह सत्य मुझे भोगना पड़ेगा अब लाल स्याह सूरज नहीं चमकेगा भाल पर सिंदूरी शाम अब कभी नहीं उगेगी न चंदा शरमएगा न चांदनी नहाएगी बस रहेगी मेरे सांथ अमावसी रात उम्र भर वही स्याह रात बोना और काटना है !