घर नहीं


किस पर कर सके भरोसा , किस पर करे यकि
यहाँ आदमी की सूरत इक रहती नहीं !

चेहरे पर लगे चेहरे कोई कमी नहीं
में ढूंढ़ता हु आदमी मिलता कोई नहीं !

किसको सुनाऊ अपने दास्ताने गम
देखि न आँख कोई जिसमे नमी  नहीं !

कोई नहीं पराया अपने तो है सभी
ये और बात है की अपने होते नहीं !

तमाम उम्र बंधे आकाश को फिरा
अंत समय मुट्ठी में राख भी नहीं !

यू तो हमारा सूरज और है हमारा चाँद
सारा जहां हमारा रहने को घर नहीं !

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