अहम वयम्

जिंदगी की राह में मेरा तुमसे मिलन हो गया
प्रीत पंथ पर तुम धरा और में गगन हो गया !

मेरा एक - एक छन ही
तेरे संग संग रहा
तुम तो अहम ही रही और में वयम् हो गया

एक एक ग्रन्थ के सभी
संदर्भ थे हमने जिए
तुम तो विचार ही रही और में मनन हो गया !

तेरे द्वार पर में तो
याचक बनकर रहा
तुम तो प्रार्थना ही रही और में नमन हो गया !

थाल में पूजा का लिए
मंत्र  को उच्चारते  रहे
तुम तो यज्ञ वेदी  ही रही और में हवन हो गया !

तुम तो दो कदम ही चली
और में चलता रहा
तुम तो मेड भर रही और में वतन हो गया

उत्तरो के व्योम में हम
प्रश्न बनके घूमते रहे
तुम तो स्रजिका ही रही और में सृजन हो गया !

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