तुम आये नहीं

दरवाजे पंथ निहारा करी
तुम आये नहीं , तुम आये नहीं
संध्याएं भी लौटकर जाने लगी
रहें भी चुप्पी ढोती रही
मैं आस का दीप जलाती रही !

खड़ी होकर आईने के सामने
रूप सवार किया ही करी
आँचल को उठाती गिराती रही
प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं
दरवाजे पंथ निहारा करी
प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं
में प्रीत में बावरी होती रही
मछली सी बेकल तड़पती रही
में हर पल भाव छुपाती रही
प्रीत आये नहीं तुम आये नहीं

मेने सेज बिछाई तुम्हारे लिए
पाँव पायल भी बांधी तुम्हारे लिए
प्याली पर प्याली गिरती रही
दरवाजे पंथ निहारा करी
प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं


में अक्षत कुमकुम रोली को
थाली में संजोए बैठी रही
में सुनी कलाई ढूंढा करी
वीर आये नहीं तुम आये नहीं
दरवाजे पंथ निहारा करी
प्रिय आये नहीं तुम आये नहीं 

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