चेहरे बदल के
बदनाम हो रहे बस्ती के अँधेरे ! बत्तमीजी कर रहे कुछ घर के सबेरे !! श्रम बिन्दुओ से जो रच रहे सभ्यता कंधे पे धो रहे है वो आपने सवेरे !! किसे करे गुहार लाचार मछरिया ! ताल के रखैया बन बैठे मछेरे !! पेट से वादे न भूखे मरेंगे ! जीने के लिए दे रहे है स्वप्न सुनहरे !! इमां के पुजारी धरम की प्रतिष्ठा ! चहरे बदल के बैठे है कुछ ऐसे लुटेरे !!