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सुबह से शाम

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चलो चले सूरज को पहाड़ पर चढ़ाए दौड़े दौदाये और खूब छकाये अँजुरी भर-भर धूप उछाले पात पात किरणें पेड़ पर चढ़ाए भर भर किल्कारिी अंबर गुंजाए चलो चले सूरज को .... मैदान में खिलाये दौड़े दौदये और खुब छकये चलो चले सूरज को ताल में दुबये साँझ घर लाए दीप् जलाये सूरज को पहाड़ पर चढ़ाए

ठंड

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गाँव शहर घूम रही बद्द्बद्दति ठंड उसको डरा ना पा रही आग भी प्रचंड बंद है दरवाजे और सारी खिडकियां धक धकाति घुसती चली आ रही है ठंड सूर्य भी लाचार है उसके सामने रजाईयों में दुबक गए सारे मुस्तंद पहनी जो स्वेटरे और ऊनी कोट हमारा मुह चिढ़ा रही कैसी है ठंड कौन करे हिम्मत जो मुक़ाबला करे बच्चों इसका नाम है कड़कड़ाती ठंड

जीवन के दो रूप

दिवस, थका मांदा, कंप्यूटर के कार्य से, उलज़कर आया चाय की प्यालियों में वोटिंग में, सैरो में, पार्को में, बंट गया जीवन श्याम की बाहो में ज़्हूल गया, भूल गया ! उधर, श्रमिकों हांफता कल को बांचना ऊँची इमारतों की तह में बसी ज़्होपडियो में संध्या को बिसर गया !

लिख

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लिखने जैसा लिख बुधुआ की बीमारी लिख आसु की लाचारी लिख राख छुपी चिंगारी लिख मौसम की दरबारी लिख लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख सूद चढ़ी अटारी लिख खेत में पड़ी दरारी लिख मेहनत की तिजारी लिख रधिया बेचारी लिख ! लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख घोटाला कारगुजारी लिख छद्मवेशी पुजारी लिख आँखों की अंधियारी लिख गालो की उजियारी लिख ! लिखना है तो लिख लिखने जैसा लिख

प्रवाह तो मिला

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चाँद न मिला, आभास तो मिला सूर्य न मिला, प्रकाश तो मिला ! गीत न मिला कोई धुन ही मिली सुने शब्द के लिए, सिलसिला तो मिला ! मंज़िल न मिली राही को मगर चलने के लिए , पंथ का विस्वास तो मिला ! थकी हुई नदी की लहरे मौन थी मंद हवा ही सही, प्रवाह तो मिला ! भटक रही थी नाव नदी की धार मैं टुटा ही सही, पर घाट तो मिला  !

इत्ते सारे काम

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नन्ही मुन्नी चिड़िया को इत्ते सारे काम न पलभर को फुर्सत न रत्ती भर आराम रोज सबेरे सूरज लाना उसको हर घर  मैं  पहुचना क्या है छोटा काम ? नन्ही मुन्नी चिड़िया को इत्ते सारे काम ! घर-आँगन की साफ-सफाई उछल-कूद  कर करती भाई क्या है छोटा काम ? नन्ही मुन्नी चिड़िया को इत्ते सारे काम ! बाजार जाना और बतियाना पाठ पढ़ना और पढ़ाना क्या है छोटा काम ?

संभल के चल

बिगड़े हुए हालात है जरा संभल के चल धूल , धुँआ , धुंध  है जरा संभल के चल पसरी हुई  है दहशते, सडको चौराहो पर तुज़हे पहुचना है घर जरा संभल के चल कोयला ही कोयला बिखरा पड़ा है मैदान मैं कैसे बच पायेगा जरा संभल के चल राह  के कुछ संगमरमरी  आचरण  भी  है     पैर  फिसल   न जाये  जरा संभल के चल ये आदर्शो की गठरी कब  तक लिए  चलेगा  हर मोड़ पर है लुटेरे जरा संभल के चल 

देखा है तुज़हे

मैंने अश्को को आखो मैं छुपाते हुए देखा है तुज़हे हर पल हस्ते हसाते देखा है तुज़हे 1 गजब के  हौसले है तेरी जिंदगी के मोत से आँखे लड़ाते  देखा है तुज़हे ! जाने कब पलक ज़हपकाते  हो तुम जब भी देखा है जागते हुए देखा  है तुज़हे ! हजार शिकवे है ज़माने से जानता हु मगर हर शिकवे से गले मिलते हुए देखा है तुज़हे ! अपने लिए कितना जिया यह जानता  हु मगर औरो के लिए सो बार मरते हुए देखा है तुज़हे ! जो हरजाई , बेवफा , बेरहम निकले उनके लिए भी दुआ मांगते  हुए देखा है  तुज़हे  ! पीड़ा इबादत , इश्क़ और इलज़ाम अपनी गजलो में समाते हुए  देखा है तुज़हे !

किस से बात करूं मन की !

किससे मैं बात करू मन की पुष्प मचल जाते है , भोरो  के संग आँगन के चेहरों के कई कई रंग ! गंध चटक जाये कब आधे तन की  ! बगिया के फूलो का अपना ही गुंजन , अपनो का सपना एक अभीरंजन ! बिखर जाये पत्तियां कब अपने पन की ! उत्तुंग शिखर पर्वत के अपने गुमान प्रवाह धार नदिया की अपनी ही तान बहती हवा कब हुई है रहन की किससे मैं बात करू मन की !