किस से बात करूं मन की !

किससे मैं बात करू मन की

पुष्प मचल जाते है , भोरो  के संग आँगन के चेहरों के कई कई रंग !

गंध चटक जाये कब आधे तन की  !

बगिया के फूलो का अपना ही गुंजन , अपनो का सपना एक अभीरंजन !

बिखर जाये पत्तियां कब अपने पन की !

उत्तुंग शिखर पर्वत के अपने गुमान प्रवाह धार नदिया की अपनी ही तान

बहती हवा कब हुई है रहन की

किससे मैं बात करू मन की !

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