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चेहरे बदल के

बदनाम हो रहे बस्ती के अँधेरे ! बत्तमीजी कर रहे कुछ घर के सबेरे !! श्रम बिन्दुओ से जो रच रहे सभ्यता कंधे पे धो रहे है वो आपने सवेरे !! किसे  करे गुहार लाचार  मछरिया ! ताल के रखैया बन बैठे मछेरे !! पेट से वादे न भूखे मरेंगे ! जीने के लिए दे रहे है स्वप्न सुनहरे !! इमां के पुजारी धरम की प्रतिष्ठा ! चहरे बदल के बैठे है कुछ ऐसे लुटेरे !!

प्रवाह तो मिला

चाँद ना मिला , आभास तो मिला सूर्य न मिला , प्रकाश तो मिला गीत न मिला कोई धुन ही मिली सुने शब्द के लिए, सिलसिला तो मिला ! मंज़िल न मिली रही को मगर चने के लिए, चलने के लिए विश्वास  तो मिला ! थकी हुई नदी की लहरे मोन थी मंद हवा ही सही, प्रवाह तो मिला ! भटक रही थी नव नदी के धार में टुटा ही सही पर घाट तो मिला !