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देखा है तुज़हे

मैंने अश्को को आखो मैं छुपाते हुए देखा है तुज़हे हर पल हस्ते हसाते देखा है तुज़हे 1 गजब के  हौसले है तेरी जिंदगी के मोत से आँखे लड़ाते  देखा है तुज़हे ! जाने कब पलक ज़हपकाते  हो तुम जब भी देखा है जागते हुए देखा  है तुज़हे ! हजार शिकवे है ज़माने से जानता हु मगर हर शिकवे से गले मिलते हुए देखा है तुज़हे ! अपने लिए कितना जिया यह जानता  हु मगर औरो के लिए सो बार मरते हुए देखा है तुज़हे ! जो हरजाई , बेवफा , बेरहम निकले उनके लिए भी दुआ मांगते  हुए देखा है  तुज़हे  ! पीड़ा इबादत , इश्क़ और इलज़ाम अपनी गजलो में समाते हुए  देखा है तुज़हे !

किस से बात करूं मन की !

किससे मैं बात करू मन की पुष्प मचल जाते है , भोरो  के संग आँगन के चेहरों के कई कई रंग ! गंध चटक जाये कब आधे तन की  ! बगिया के फूलो का अपना ही गुंजन , अपनो का सपना एक अभीरंजन ! बिखर जाये पत्तियां कब अपने पन की ! उत्तुंग शिखर पर्वत के अपने गुमान प्रवाह धार नदिया की अपनी ही तान बहती हवा कब हुई है रहन की किससे मैं बात करू मन की !