जीवन के दो रूप

दिवस,
थका मांदा,
कंप्यूटर के कार्य से,
उलज़कर आया
चाय की प्यालियों में
वोटिंग में, सैरो में, पार्को में,
बंट गया
जीवन श्याम की बाहो में
ज़्हूल गया, भूल गया !

उधर,
श्रमिकों हांफता
कल को बांचना
ऊँची इमारतों की तह में बसी
ज़्होपडियो में
संध्या को बिसर गया !

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