मदारी खाये

खड़ा - खड़ा तू मेड पर
जार - जार क्यों रोए
बोया पेड़ बाबुल का
तो आम कहाँ से होए !

परिभाषाएँ बदल गयी
बदल गया परिवेश
जिसके है में लाठी
हुई उसकी भेस !

पंगती में खड़े - खड़े
बरस हुआ अवधेश
अंधा बांटे रेवड़ी
अपने अपनों को दे !

चमचा मोसा न कहो
सब ऑफिस को फेर
पनि में रहकर करे
कौन मगर से बेर !

भ्रस्टाचार ख़त्म करेंगे
दवा जता रहे
वे अपनी हथेली पर
सरसो उगा  रहे !

अब का होए रोत से
जग की रीत बताए
नाचे कूदे बांदरी
मॉल मदारी खाये !




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