सूरज को बोन दो

बहुत ढो चुके अंधियारे अब उजियारे धोने दो
उगा चुके हम काली फैसले अब सूरज को बोन दो !

कब तक बोने बने रहे हम अपने ही आकाशों में
कब तक खुद को छलते रहे
हम अपने विश्वासों में

बहुत सह चुके बौनेपन को अब आकाश होने दो
उगा चुके हम काली फैसले अब सूरज को बोन दो !

कब तक गतिमय होने का
यह मतिभ्रम हम पाले

स्थिर रहकर आपने ही
पावो में उगाए छाले !

बहुत रह लिए स्थिर हम, अब गतिमान होने दो
उगा चुके हम काली फसले अब सूरज को बोन दो !

आश्वासन की मदिरा
कब तक गले उतारे
आशाभरी निगाहो से
कब तक शुन्य निहारे

बहुत रह चुके मदिरमय अब होश में होने दो
ऊगा चोक हम काली फसले अब सूरज को बोने दो !

अब तक अंधियारे बीने
और कब तक अक्षर रोपे
आने वाले कल की हम
कैसे उत्तर सोपे !

बहुत लग चुके प्रश्नचिन्ह अब उत्तर होने दो
ऊगा चुके हम काली फैसले अब सूरज को बोन दो !

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