रौशनी जाने कहाँ
इतनी बढ़ गयी है भूख की रोटी भी बट गयी
यू बस गयी है बस्तियां की जमीन घट गयी !
भीड़ भी लगने लगी आजकल डरावनी
खौफ बन के साये सा तन से चिपट गई !
सूर्य भी लाचार सा लगने लगा है आजकल
रौशनी कहाँ रह में भटक गयी !
मीठी मुस्कान, किराने की दूकान, सहकारी ब्याज
इस बड़े परिवार में आदमी गोट सारी बट गई
दो ही फूल खिलाए उसने, घर उसका महक गया !
चाँद भी आकर ठहर गया, चांदनी भी छिटक गयी !
Comments
Post a Comment