आलम बदल गये
जब तलक था होश, वीरान थी बहार !
जाम जब उठाया तो मंजर बदल गए !!
यह हमारी बदनसीबी और उसका ये सिला !
इकरार थे हम कर रहे और वो बदल गये !!
जिनने कस्मे खाई थी एक नाव में बैठकर !
साहिल जो मिला तो मकसद बदल गये !!
रौशनी में नहाई होती है यू तो हर सुबह !
जब जब चिराग बुझे है आलम बदल गये !!
उनका वादा था तमाम उम्र का !
रहबर उन्हें मिले तो रही बदल गये !!
हम क्या बया करे बदलने की हदो का !
बरगद के नीचे बैठकर सिद्धार्थ बदल गये
जाम जब उठाया तो मंजर बदल गए !!
यह हमारी बदनसीबी और उसका ये सिला !
इकरार थे हम कर रहे और वो बदल गये !!
जिनने कस्मे खाई थी एक नाव में बैठकर !
साहिल जो मिला तो मकसद बदल गये !!
रौशनी में नहाई होती है यू तो हर सुबह !
जब जब चिराग बुझे है आलम बदल गये !!
उनका वादा था तमाम उम्र का !
रहबर उन्हें मिले तो रही बदल गये !!
हम क्या बया करे बदलने की हदो का !
बरगद के नीचे बैठकर सिद्धार्थ बदल गये
Comments
Post a Comment